छत्तीसगढ़ : में जबरन या प्रलोभन के जरिए धर्मांतरण पर रोक लगाने के उद्देश्य से पारित छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक अब आधिकारिक रूप से कानून बन गया है। विधानसभा से 19 मार्च को पारित इस विधेयक पर राज्यपाल के हस्ताक्षर के बाद इसे राजपत्र में प्रकाशित कर दिया गया है।
लंबी बहस के बाद मिला कानून का रूप, 1968 के नियमों में बदलाव
विधेयक को उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा द्वारा प्रस्तुत किया गया था, जिसके बाद विस्तृत चर्चा के बाद इसे मंजूरी दी गई। सरकार का मानना है कि 1968 के पुराने प्रावधान वर्तमान परिस्थितियों के लिए पर्याप्त नहीं थे, इसलिए नए कानून की आवश्यकता पड़ी।
धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया अब पूरी तरह पारदर्शी, कड़ी निगरानी व्यवस्था
नए कानून के तहत अब धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को निर्धारित प्राधिकृत अधिकारी के समक्ष आवेदन देना होगा। इसके बाद सूचना सार्वजनिक की जाएगी और आपत्तियां आमंत्रित की जाएंगी। जांच पूरी होने के बाद ही प्रमाणपत्र जारी किया जाएगा।
धर्मांतरण पर सख्त निगरानी, संस्थाओं का पंजीकरण अनिवार्य
इस कानून में धर्मांतरण कराने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं के लिए पंजीयन अनिवार्य कर दिया गया है। उन्हें हर वर्ष विस्तृत रिपोर्ट भी देनी होगी। ग्राम सभाओं को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया गया है ताकि स्थानीय स्तर पर पारदर्शिता बनी रहे।
कड़े दंड प्रावधान: 7 साल से लेकर आजीवन कारावास तक सजा
कानून में अलग-अलग परिस्थितियों में सख्त सजा का प्रावधान किया गया है।
सामान्य अवैध धर्मांतरण: 7 से 10 साल की सजा और 5 लाख रुपये जुर्माना
महिला, नाबालिग, एससी, एसटी मामलों में: 10 से 20 साल की सजा और 10 लाख रुपये जुर्माना
सामूहिक धर्मांतरण: 10 साल से आजीवन कारावास और 25 लाख रुपये जुर्माना
भय, प्रलोभन या धोखे से धर्मांतरण: 10 से 20 साल की सजा और 30 लाख रुपये तक जुर्माना
लोक सेवक और संगठनों पर भी कड़ी कार्रवाई का प्रावधान
यदि कोई लोक सेवक इस तरह के अपराध में शामिल पाया जाता है तो उसे 10 से 20 साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। वहीं धन या लालच के माध्यम से धर्मांतरण कराने पर भी कठोर दंड तय किया गया है।
पुनरावृत्ति पर आजीवन कारावास, पीड़ितों के लिए क्षतिपूर्ति का प्रावधान
कानून में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि अपराध दोहराया जाता है तो आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है। साथ ही पीड़ितों को न्यायालय द्वारा मुआवजा देने का प्रावधान भी शामिल किया गया है।
जांच और सुनवाई की व्यवस्था, आरोपी पर साबित करने की जिम्मेदारी
इस कानून के तहत मामलों की जांच उप निरीक्षक या उससे वरिष्ठ अधिकारी करेंगे। खास बात यह है कि ऐसे मामलों में प्रमाण का भार आरोपी पर होगा। सुनवाई के लिए विशेष न्यायालयों को अधिसूचित किया जाएगा।
सामाजिक बहस तेज, कानून के प्रभाव को लेकर जारी चर्चा
इस कानून के लागू होने के बाद प्रदेश में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। सरकार इसे पारदर्शिता और सामाजिक समरसता का कदम बता रही है, जबकि कई वर्ग इसके प्रभाव को लेकर अपनी चिंताएं भी व्यक्त कर रहे हैं।







